काल सर्प दोष
काल सर्प (कल्सर्प) योग तब बनता है जब सातों मुख्य ग्रह (सूर्य से शनि) राहु–केतु अक्ष के एक ओर हों। राहु से केतु की 180° चाप में हों तो काल सर्प; केतु से राहु की चाप में हों तो काली सर्प। नामित प्रकार (अनंत, कुलिक, वासुकि आदि) राहु की राशि से आता है।
आंशिक रूप — ग्रहों का दोनों ओर होना — आम है और पूर्ण काल सर्प नहीं माना जाता।
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अपना परिणाम कैसे पढ़ें
पूर्ण योग के लिए सातों ग्रह राहु–केतु अक्ष की एक ही ओर होने चाहिए। एक भी ग्रह दूसरी ओर हो तो परिणाम है — काल सर्प नहीं।
प्रकार का नाम राहु की राशि से लिया जाता है, योग अधूरा होने पर भी — ताकि आप देख सकें कि छाया ग्रह कहाँ हैं।
गणना कैसे होती है
डी1 निरयन (लाहिरी) देशांतरों से, मध्य राहु–केतु के साथ — वही स्थितियाँ जो RishiAstro कुंडली में हैं। अक्ष से संयोग पूर्ण-राशि है; चापें दोनों ग्रहों के बीच की दो 180° कमानें हैं।
इसे अपनी पूरी कुंडली में देखें
यह आपकी जन्म कुंडली का एक खंड है। पूरी मुफ़्त कुंडली बनाएँ — कुंडलियाँ, दशाएँ, दोष, पंचांग और बहुत कुछ।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
काल सर्प दोष क्या है?
कहा जाता है कि यह तब बनता है जब सातों मुख्य ग्रह कुंडली के एक ओर राहु और केतु के बीच घिरे हों। व्याख्या बहुत भिन्न है; निष्कर्ष से पहले पूरी कुंडली देखी जाती है।
काल सर्प और काली सर्प में क्या अंतर है?
काल सर्प में सातों ग्रह राहु-से-केतु चाप में होते हैं (राहु सर्प का सिर)। काली सर्प में वे केतु-से-राहु चाप में होते हैं।
क्या काल सर्प के लिए सटीक जन्म समय ज़रूरी है?
हाँ — ग्रहों के देशांतर और छाया ग्रह सही जन्म समय और स्थान पर निर्भर करते हैं।